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Maine dekha ki wo mere saath thi

Nishant Sidhu
मैंने देखा कि वो मेरे साथ थी एक जहाँ में उम्र ढलने तक मगर वो जहाँ सिर्फ़ रहा सूरज निकलने तक उसने कहा था कि लगता है अँधेरे से डर मुझे सो रौशन रही उसकी ज़िन्दगी मेरे पूरा जलने तक कैसे मौसम बदलने से पहले बदल जाती है चाहतें तेरी कम से कम ठहर जाया कर मौसम बदलने तक आज कमवक़्त दर दर की ठोकरें खा रही है वो जिसे मैंने ठोकर न लगने दी मेरे साथ चलने तक मैंने सोचा था देखेगी मेरे आँसू तो पिघल जाएगी मैं पूरा बह गया उसके पिघलने तक भला कैसे दूसरे दिन ही हो गई दूसरी मोहब्बत तुझको इंतज़ार तो करती मेरा जनाज़ा निकलने तक