मैंने देखा कि वो मेरे साथ थी एक जहाँ में उम्र ढलने तक
मगर वो जहाँ सिर्फ़ रहा सूरज निकलने तक
उसने कहा था कि लगता है अँधेरे से डर मुझे
सो रौशन रही उसकी ज़िन्दगी मेरे पूरा जलने तक
कैसे मौसम बदलने से पहले बदल जाती है चाहतें तेरी
कम से कम ठहर जाया कर मौसम बदलने तक
आज कमवक़्त दर दर की ठोकरें खा रही है वो
जिसे मैंने ठोकर न लगने दी मेरे साथ चलने तक
मैंने सोचा था देखेगी मेरे आँसू तो पिघल जाएगी
मैं पूरा बह गया उसके पिघलने तक
भला कैसे दूसरे दिन ही हो गई दूसरी मोहब्बत तुझको
इंतज़ार तो करती मेरा जनाज़ा निकलने तक

