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Bag kho gaya

Lalit Kumar Pandey
क्या हुआ? ये मुंह क्यों लटका रक्खा है भई बहुत दिनों से दिखा नहीं तू, कहां गया था, कब आया है? लगता है, कुछ खो आया है। अरे यार, अब क्या बतलाऊं, बात अजब है, क्या समझाऊं एक बैग था, बड़ा पुराना, नहीं मिल रहा कई दिनों से इधर-उधर मैं देख चुका हूं, सबसे मिलकर पूछ चुका हूं या मैं रखकर भूल गया हूं, या कोई चल दिया है लेकर बैग! क्या-क्या रक्खा था उसमें? यार, बहुत कुछ था उसमें तो सब-कुछ तो अब याद नहीं है, ठीक-ठीक कुछ याद नहीं है बहुत दिनों से खुला नहीं था, मैला था और धुला नहीं था ख्वाब रखें थे कितने सारे, कितनी सारी बेफिक्री थी बेवकूफियां ठुसी हुईं थी, कितनी सारी हंसी पड़ी थी पहले प्यार की उलझन थी और, पापा की एक छड़ी पड़ी थी एक पोटली जिद्दी सी थी, प्यारी-प्यारी पिद्दी सी थी लम्बी-लम्बी नींदें थी, मां-पापा की उम्मीदें थीं एक जेब में वादे थे, कुछ कसमें और इरादे थे ज़ंग लग गया था कुछ में, कुछ कच्चे-पक्के आधे थे थोड़ी-थोड़ी बंक क्लासें, एक चाय और चार गिलासें लट्टू, कन्चे, गिल्ली-डंडे, साइकिल, रस्ते, पेन्सिल, बस्ते, और न जाने क्या-क्या सब था। ओ! भाई, मेरा बैग खो गया क्यों हंस रहा? क्या हो गया? बात तो बिलकुल सही है बन्धु अब, एक मजे की बात भी सुन तू मेरा भी एक बैग था ऐसा, एकदम डिट्टो, तेरे जैसा एक दिन घर एक बन्दा आया, अपना नाम, “समय” बतलाया। पापा ने दरवाज़ा खोला, किया नमस्ते, हंसकर बोला, बोला, बेटा बड़ा हो गया, पांव पे अपने खड़ा हो गया। इतनी सारी जिम्मेदारी, आगे डगर बड़ी है भारी। उसको अब आराम नहीं है, बैग का अब कुछ काम नहीं है। पड़े-पड़े ये फट जाएगा, काम तो अब क्या ही आएगा। घरवाले भी निपट अनाड़ी, समझ रहे थे उसे कबाड़ी। यार! बैग उठाया उसे दे दिया। वो भी साला बड़ा बेशरम, बैग लिया और फ़ुर्र, भाई, फ़ुर्र, फ़ुर्र और फ़ुर्र। तब से अब तक ढूंढ रहा हूं लेकिन जैसे सींग गधे का, अभी तलक तो मिला नहीं है चल मिट्टी पा, जो हुआ हो गया, खोना ही था बैग, खो गया बात बड़ी सिम्पल है प्यारे, “समय” हमारे बैग ले गया। और तुम्हारे?